दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग इन दिनों भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर राष्ट्रपति ली अपनी पत्नी किम हे-क्युंग के साथ 19 अप्रैल को दिल्ली पहुंचे. यह यात्रा आठ वर्षों बाद किसी दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति की पहली भारत यात्रा है, जिसे दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देने के अवसर पर देखा जा रहा है. उनकी इस यात्रा के दौरान आर्थिक, रक्षा, जहाज निर्माण, एआई और रणनीतिक साझेदारी जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है. दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के इस भारत दौरे ने दोनों देशों के रिश्तों को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है. आज के मजबूत भारत दक्षिण कोरिया नींव स्वतंत्र भारत के पहले विदेश सचिव और प्रमुख राजनयिक केपीएस मेनन ने 1940 के दशक के अंत में रखी थी. जब कोरियाई प्रायद्वीप जापानी कब्जे से आजाद होकर विभाजन की कगार पर था, तब भारत ने जो भूमिका निभाई, उसने दक्षिण कोरिया के निर्माण की नींव मजबूत करने में योगदान दिया. भारत-कोरिया संबंध केवल वर्तमान रणनीतिक साझेदारी की कहानी नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक जुड़ाव की भी याद दिलाता है, जिसमें एक भारतीय राजनयिक की अहम भूमिका रही थी. बहुत कम लोग जानते हैं कि कोरियाई प्रायद्वीप के कठिन दौर में भारत और खास तौर पर भारतीय कूटनीति ने इस कड़ी में केपीएस मेनन का नाम विशेष रूप से सामने आता है. केपीएस मेनन का पूरा नाम कुमार पद्मनाभ शिवशंकर मेनन था. उनका जन्म 18 अक्टूबर 1898 को केरल में हुआ था. वे भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) के अधिकारी थे और स्वतंत्र भारत के पहले विदेश सचिव बने. उन्होंने चीन में भारत के राजदूत के रूप में भी सेवा की. मेनन न केवल कुशल राजनयिक थे, बल्कि एक लेखक और डायरिस्ट भी थे, जिनकी किताबें भारतीय विदेश नीति की समझ बढ़ाती हैं. 1947 में कोरिया जापान से स्वतंत्र हुआ, लेकिन 38वें समानांतर रेखा पर सोवियत संघ और अमेरिका के प्रभाव में विभाजित हो गया. उत्तर में कम्युनिस्ट शासन और दक्षिण में अलग व्यवस्था की आशंका थी. संयुक्त राष्ट्र ने कोरिया में एकता और स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए 9 सदस्यीय यूनाइटेड नेशंस टेम्परेरी कमीशन ऑन कोरिया गठित की. इस समिति की अध्यक्षता भारत को सौंपी गई और केपीएस. मेनन को इसका चेयरमैन नियुक्त किया गया. 1950 के दशक में कोरियाई युद्ध ने पूरी दुनिया को दो ध्रुवों में बांट दिया था. एक ओर अमेरिका और उसके सहयोगी थे, तो दूसरी ओर सोवियत संघ और चीन का समर्थन उत्तर कोरिया को मिला हुआ था. इस संघर्ष ने कोरियाई प्रायद्वीप को तबाह कर दिया. ऐसे समय में भारत ने न तो किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनना चुना और न ही निष्क्रिय दर्शक बना रहा, बल्कि एक संतुलित और शांति-स्थापना की भूमिका निभाई. इसी दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि के रूप में केपीएस मेनन ने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक जिम्मेदारी संभाली. वे उस दौर में न केवल भारत की विदेश नीति के प्रमुख चेहरों में से थे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में भी देखे जाते थे. कोरियाई युद्ध के दौरान सबसे जटिल मुद्दों में से एक था युद्धबंदियों की वापसी. इस मुद्दे पर अमेरिका और कम्युनिस्ट खेमे के बीच गहरा मतभेद था. यहां केपीएस मेनन ने एक व्यावहारिक और मानवीय समाधान सुझाया, जिसे बाद में ‘इंडियन फॉर्मूला’ के रूप में जाना गया. दक्षिण कोरिया के कई इतिहासकार और राजनयिक आज भी मेनन को उस दौर के नायक के रूप में याद करते हैं, जब नया स्वतंत्र भारत वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रहा था. दक्षिण कोरिया ने जिस तेजी से खुद को एक विकसित अर्थव्यवस्था में बदला, उसकी शुरुआत इसी स्थिरता से हुई. और इस स्थिरता को स्थापित करने में भारत की कूटनीति और खासकर केपीएस मेनन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आज जब दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति भारत दौरे पर हैं, तो यह केवल व्यापार, तकनीक और रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है. दोनों देशों के रिश्तों की जड़ें उस दौर में भी मिलती हैं, जब वैश्विक राजनीति बेहद जटिल थी और भारत ने एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में भूमिका निभाई. भारत की ‘नॉन-अलाइनमेंट’ नीति और शांति-स्थापना के प्रयासों ने उसे एक भरोसेमंद साझेदार बनाया. यही वजह है कि आज भी दक्षिण कोरिया भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है.
