बिहार की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक बदलाव होने जा रहा है। सम्राट सरकार ने राज्य की सभी ग्राम पंचायतों के नए सिरे से गठन और परिसीमन का फैसला लिया है। अब पंचायतों की सीमाएं और पहचान पुराने आधार पर नहीं, बल्कि राजस्व ग्राम और जनसंख्या के नए मानकों के आधार पर तय होंगी।पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार ने सोमवार को इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। नए नियम लागू होने के बाद राज्य की हजारों पंचायतों के नाम, मुख्यालय और भौगोलिक सीमाओं में बदलाव की संभावना है। सरकार ने नए पंचायत गठन के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया है। राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश और निगरानी में सभी जिलों के डीएम अपने-अपने क्षेत्रों में पंचायतों के नए स्वरूप का निर्धारण करेंगे।इसके साथ ही जिला परिषद, पंचायत समिति और वार्ड क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण को लेकर भी अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी की गई हैं। नई व्यवस्था के तहत यदि किसी पंचायत में एक से अधिक गांव शामिल होंगे, तो उसका मुख्यालय उस गांव में बनाया जाएगा जिसकी आबादी सबसे अधिक होगी। पंचायत का आधिकारिक नाम भी उसी प्रमुख गांव के नाम पर रखा जाएगा।हालांकि, सरकार ने सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान भी किया है। यदि किसी पंचायत क्षेत्र में SC, ST और OBC वर्गों की संयुक्त आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है, तो मुख्यालय उस गांव में बनाया जा सकता है जहां इन वर्गों की जनसंख्या का अनुपात सबसे ज्यादा होगा। नई व्यवस्था में प्रत्येक प्रखंड को एक स्वतंत्र इकाई माना जाएगा। पंचायत क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण उत्तर-पश्चिम दिशा से शुरू होकर दक्षिण-पूर्व दिशा तक किया जाएगा।सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी राजस्व ग्राम को अनावश्यक रूप से दो अलग-अलग पंचायतों में नहीं बांटा जाएगा। केवल विशेष परिस्थिति में ही बड़े आबादी वाले गांव को विभाजित किया जा सकेगा। पंचायतों की नई सीमाएं तय करते समय प्राकृतिक और स्पष्ट सीमाओं का ध्यान रखा जाएगा। मुख्य सड़क, रेलवे लाइन, नदी, नहर और बड़े सार्वजनिक संस्थानों को सीमा निर्धारण का आधार बनाया जाएगा, ताकि आम लोगों को पंचायत क्षेत्र की पहचान में परेशानी न हो।पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए प्रमंडलीय आयुक्तों को जिम्मेदारी दी गई है। सरकार का यह फैसला सिर्फ पंचायतों के नाम बदलने तक सीमित नहीं है। नए परिसीमन से पंचायतों की प्रशासनिक संरचना, वार्ड गठन और आने वाले पंचायत चुनावों की राजनीति पर भी सीधा असर पड़ेगा।सरकार का दावा है कि आबादी और प्रशासनिक जरूरतों के हिसाब से पंचायतों के पुनर्गठन से स्थानीय शासन मजबूत होगा और विकास योजनाओं का बेहतर तरीके से क्रियान्वयन हो सकेगा।हालांकि, पंचायतों की सीमाओं और नामों में बदलाव के बाद ग्रामीण इलाकों में नई राजनीतिक गोलबंदी भी देखने को मिल सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि नए परिसीमन से बिहार की जमीनी सियासत में कितना बदलाव आता है।
