जहां मुल्क के ज़्यादातर हिस्सों में अभी भी चांद के दीदार का बेसब्री से इंतजार जारी है, वहीं बिहार के नालंदा जिले के सिलाव प्रखंड के बड़ाकर समेत कई गांवों में ईद-उल-फितर का जश्न 24 घंटे पहले ही पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ मना लिया गया। ये नज़ारा जितना दिलचस्प है, उतना ही हैरतअंगेज भी क्योंकि यहां भारत में कल, तो यहां आज वाली कहावत हक़ीकत बन गई। गुरुवार की शाम जैसे ही इन गांवों में चांद का दीदार हुआ, फिज़ा में खुशियों की लहर दौड़ गई। मस्जिदों और ईदगाहों में रौनक बढ़ गई और शुक्रवार की सुबह होते-होते नमाज़-ए-ईद अदा कर लोगों ने गले मिलकर एक-दूसरे को मुबारकबाद दी। हर तरफ ईद मुबारक की सदाएं गूंजती रहीं और माहौल पूरी तरह से रूहानी और जश्न में डूबा नज़र आया। दरअसल, इस अनोखी रिवायत के पीछे छुपा है इन गांवों का मजबूत सऊदी कनेक्शन। बड़ाकर और आसपास के इलाकों के बड़ी तादाद में लोग रोजगार के सिलसिले में सऊदी अरब में रहते हैं। सालों से चली आ रही परंपरा के मुताबिक, वहां चांद दिखने के ऐलान के साथ ही ये लोग अपने गांवों में भी उसी हिसाब से त्योहार मनाते हैं। गुरुवार को जब सऊदी अरब के कैलेंडर के मुताबिक चांद नजर आया, तो यहां के लोगों ने भी बिना देर किए शुक्रवार को ईद मनाने का फैसला कर लिया। सुबह होते ही बच्चे, बुजुर्ग और नौजवान नए और पाकीज़ा लिबासों में ईदगाह की तरफ रवाना हुए। नमाज़ के बाद मुल्क की सलामती, अमन-चैन और भाईचारे के लिए खास दुआएं मांगी गईं। इसके बाद गले मिलकर खुशियां बांटी गईं, जिससे पूरे गांव में मोहब्बत और अपनत्व की फिज़ा कायम हो गई। घरों में सिवइयों और लजीज पकवानों की खुशबू फैल गई। बच्चों के चेहरों पर ईदी पाने की चमक साफ दिखी, जबकि बड़े-बुजुर्ग मेहमाननवाज़ी में मशगूल रहे। ग्रामीणों का कहना है कि उनके लिए ईद सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि सात समंदर पार बसे अपनों की याद, उनकी रिवायत और जज़्बात से जुड़ा एक मुकद्दस रिश्ता है जिसे वो हर हाल में निभाते हैं।
