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कालीन भैया किडनैप, गुड्डू भैया की एंट्री पर शोर और रवि किशन का भौकाल,

‘मिर्जापुर’ की दुनिया में फिर गोलियां चल रही हैं. फिर गद्दी का खेल है. फिर पुराने चेहरे आमने-सामने हैं. फर्क बस इतना है कि इस बार खेल ओटीटी की स्क्रीन पर नहीं, बड़े पर्दे पर हो रहा है. इसके बाद कहानी उन्हें बचाने से ज्यादा मिर्जापुर की गद्दी के खेल में उलझती जाती है. गुड्डू भैया हैं. मुन्ना हैं. बबलू हैं. और इस बार सबसे बड़ा दांव रवि किशन का किरदार खेल रहा है. अगर आप सोच रहे हैं कि फिल्म सिर्फ पुराने किरदारों को एक बार फिर साथ खड़ा करके पुरानी यादें बेचती है, तो ऐसा नहीं है. फिल्म में पुराने किरदारों की वही पहचान है, लेकिन कहानी को नए ट्विस्ट और नए रिश्तों के साथ आगे बढ़ाया गया है. गुड्डू भैया जब भी स्क्रीन पर आते हैं, माहौल बदल जाता है. थिएटर में शोर सुनाई देता है और समझ आता है कि इस किरदार की फैन फॉलोइंग अब भी कम नहीं हुई है. अली फजल ने गुड्डू भैया के अंदाज को बरकरार रखा है. उनकी बॉडी लैंग्वेज हो या फाइट सीक्वेंस, किरदार में वही पुराना एटीट्यूड नजर आता है. खासकर उनके एक्शन सीन फिल्म की बड़ी ताकत हैं. कई जगह तो ऐसा लगता है जैसे किसी सुपरहीरो फिल्म में एक बड़े विलेन को खत्म करने के लिए सारे हीरो एक साथ उतर आए हों. फर्क बस इतना है कि यहां सुपरहीरो की जगह ‘मिर्जापुर’ के वो किरदार हैं, जिनके हाथों में बंदूक है और हिसाब बराबर करने का अपना तरीका. बबलू के रोल में जीतेंद्र कुमार स्क्रीन पर आते हैं तो कहानी में पुराना स्वाद लौटता है. उनकी मौजूदगी सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं है. उनके किरदार को एक्शन और ड्रामा दोनों में जगह मिलती है. और फिल्म का क्लाइमेक्स यहां सबसे बड़ा खेल करता है. जिन किरदारों ने एक-दूसरे के खिलाफ खून की लड़ाई लड़ी है, वही एक वक्त पर साथ खड़े नजर आते हैं. फिल्म खत्म होने के बाद अगर किसी एक कलाकार की परफॉर्मेंस सबसे ज्यादा याद रहती है, तो वह रवि किशन हैं. उनका किरदार कहानी के बीच में कहीं से आता हुआ चेहरा नहीं है. धीरे-धीरे पूरी कहानी उनके इर्द-गिर्द घूमने लगती है. उनकी नजर मिर्जापुर की गद्दी पर है और इसके लिए वह अपना पूरा खेल तैयार करते हैं. रवि किशन ने किरदार की चालाकी, महत्वाकांक्षा और तेवर को जिस तरह पकड़ा है, वह फिल्म को मजबूत बनाता है. कई सीन में वह सामने मौजूद बाकी किरदारों पर भारी पड़ते हैं. यानी गुड्डू भैया का स्वैग अपनी जगह है,  ‘मिर्जापुर’ में सिर्फ गोलियां नहीं चलतीं. किरदारों के पीछे उनकी अपनी कहानियां भी हैं. फिल्म मुन्ना भैया की बैकस्टोरी को भी छूती है. मुन्ना की मां उन्हें बचाने के लिए अपनी जान दे देती हैं. यही याद उनके भीतर कहीं दबकर रह जाती है. बाद में जब मुन्ना बबलू की मां को मारने पहुंचते हैं और वह उन्हें बचा लेती हैं, तो उन्हें अपनी मां की याद आ जाती है. यही पल उनके भीतर कुछ बदल देता है. यह ट्रैक फिल्म में इमोशनल वजन जोड़ता है और मुन्ना के किरदार को सिर्फ गुस्सैल और हिंसक इंसान बनाकर नहीं छोड़ता. फिल्म का एक बड़ा ट्विस्ट वीणा के अतीत से जुड़ा है. शादी से पहले वीणा का एक लोहार प्रेमी था. दोनों शादी नहीं कर सके और वीणा कालीन भैया की पत्नी बन गईं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. दोनों के बीच संपर्क बना रहा.अब ट्विस्ट देखिए. यही प्रेमी आगे चलकर रवि किशन का राइट हैंड बन जाता है. उसका निशाना कालीन भैया हैं. दूसरी तरफ रवि किशन की नजर मिर्जापुर की गद्दी पर है. मतलब एक तरफ गद्दी का खेल है. दूसरी तरफ बदले की आग. और इनके बीच छिपा हुआ है वीणा का पुराना रिश्ता. जब यह राज खुलने का खतरा पैदा होता है, तो वीणा खुद अपने हाथों से अपने प्रेमी को गोली मार देती हैं. यहां फिल्म अचानक एक अलग ही मोड़ ले लेती है. ‘मिर्जापुर’ के पुराने डायलॉग्स इतने पॉपुलर हैं कि फिल्म के सामने सबसे बड़ा खतरा यही था कि कहीं वह उन्हीं संवादों को बार-बार दोहराकर नॉस्टैल्जिया बेचने न लगे. लेकिन यहां ऐसा नहीं होता. कुछ पुराने संदर्भ जरूर हैं, लेकिन ज्यादातर डायलॉग नए हैं. कई संवाद ऐसे हैं जिन पर थिएटर में रिएक्शन मिलता है और सोशल मीडिया पर आने वाले दिनों में मीम बनने की पूरी गुंजाइश है. यानी मेकर्स ने सिर्फ पुराने वायरल डायलॉग्स के भरोसे फिल्म नहीं छोड़ी है. ‘मिर्जापुर’ की असली ताकत सिर्फ बंदूक और गद्दी नहीं है. इसकी दुनिया यूपी से निकलती है और फिल्म इस लोकल फ्लेवर को बनाए रखती है. यादव, शुक्ला और लोहार जैसे समुदायों के संदर्भ कहानी में आते हैं. छोटे-छोटे लोकल रेफरेंस भी फिल्म की दुनिया को जमीन से जोड़े रखते हैं. यही चीज फिल्म को किसी भी सामान्य गैंगस्टर ड्रामा से अलग बनाती है. फिल्म खत्म होती है, लेकिन ‘मिर्जापुर’ की कहानी खत्म होती हुई नहीं लगती. क्लाइमेक्स के बाद साफ संकेत मिलता है कि इस दुनिया में अभी और खेल बाकी है. यानी गद्दी की लड़ाई का अगला अध्याय आने की गुंजाइश पूरी तरह छोड़ी गई है. गुड्डू भैया की एंट्री पर थिएटर में शोर मिलता है. मुन्ना की कहानी इमोशनल करती है. बबलू पुरानी यादें वापस लाते हैं.. फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार, एक्शन और ट्विस्ट हैं. कुछ जगह कहानी और ज्यादा कस सकती थी, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म की रफ्तार और लगातार बदलते समीकरण इसे बांधे रखते हैं.

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