बिहार में कमजोर मानसून ने इस बार खरीफ सीजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल धान पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश होने के कारण राज्य में धान की रोपनी बुरी तरह प्रभावित हुई है। हालात ऐसे हैं कि लक्ष्य के मुकाबले अब तक केवल 62 प्रतिशत रकबे में ही धान की रोपनी हो सकी है, जबकि 38 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र अब भी रोपनी का इंतजार कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो राज्य में धान उत्पादन 15 से 20 प्रतिशत तक घट सकता है, जिससे लाखों किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा। कृषि विभाग के अनुसार, चालू खरीफ मौसम में 37.82 लाख हेक्टेयर में धान की रोपनी का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि 27 जुलाई तक केवल 23.33 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही रोपनी हो पाई है। वहीं कुल खरीफ फसलों की बुआई और रोपनी भी लक्ष्य के मुकाबले 63.52 प्रतिशत ही हो सकी है। दूसरी ओर, मक्के की बुआई अपेक्षाकृत बेहतर रही है और 2.71 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले करीब 90 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। राज्य के कई जिले धान की रोपनी में काफी पीछे हैं। जमुई (9%), गया (13%), शेखपुरा (19%), औरंगाबाद (21%), नवादा (22%), बांका (29%), जहानाबाद (32%), अरवल (40%), मुंगेर (43%), भोजपुर (45%) और नालंदा (47%) जैसे जिलों में आधे से भी कम क्षेत्र में रोपनी हो पाई है। इसके विपरीत किशनगंज (99%), पश्चिम चंपारण (98%), पूर्वी चंपारण (96%), मधेपुरा (93%), गोपालगंज (92%), सहरसा (92%) और मुजफ्फरपुर (90%) जैसे जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण बिहार की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। गया, नवादा, औरंगाबाद, बांका, जहानाबाद और अरवल जैसे जिलों में बारिश की भारी कमी के कारण किसान अभी तक रोपनी पूरी नहीं कर सके हैं। जिन क्षेत्रों में रोपनी हो चुकी है, वहां भी पर्याप्त वर्षा नहीं होने से खेत सूखने लगे हैं, जिससे पौधों के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। संभावित सूखे जैसी स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने राहत की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। किसानों को सिंचाई के लिए डीजल अनुदान देने की योजना बनाई गई है। साथ ही मक्का, ज्वार और बाजरा जैसी वैकल्पिक फसलों के बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। कृषि विभाग किसानों को डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है, ताकि कम पानी में भी धान की खेती संभव हो सके।
