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35 मिमी की खामोश जंग: जब रीढ़ की गहराइयों में लिखी गई एक ऐतिहासिक विजयगाथा*

कभी कभी इतिहास शोर से नहीं, सन्नाटे में रचा जाता है। जहाँ शब्द नहीं, केवल धड़कनों की आवाज़ होती है। जहाँ हर मिलीमीटर एक निर्णय होता है और हर निर्णय जीवन का भविष्य तय करता है। ऐसे ही एक अद्वितीय क्षण में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पटना ने चिकित्सा जगत में वो कर दिखाया जिसे अब लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स 2026 ने भी अमर कर दिया है। 9 मार्च 2025…एक तारीख जो अब केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं बल्कि साहस और सटीकता की मिसाल बन चुकी है। एक 42 वर्षीय मरीज की सर्वाइकल स्पाइन में गहराई तक धंसी 35 मिमी लंबी मछली का कांटा। एक ऐसा संकट जहाँ ज़रा सी चूक स्थायी अपंगता का कारण बन सकती थी। लेकिन जहाँ चुनौती अपनी चरम सीमा पर थी वहीं से शुरू हुई एक असाधारण कहानी। एम्स पटना की न्यूरोसर्जरी टीम जिसका नेतृत्व कर रहे थे डॉ. सरज कुमार सिंह और उनके साथ थीं डॉ. क्रांति भावना। सुबह 9 बजे ऑपरेशन थिएटर के दरवाज़े बंद हुए। बाहर समय अपनी रफ्तार से चलता रहा लेकिन भीतर हर सेकंड एक परीक्षा थी। 4 घंटे 5 मिनट….न सिर्फ एक सर्जरी का समय, बल्कि धैर्य, एकाग्रता और अद्भुत कौशल की पराकाष्ठा। रीढ़ की नाज़ुक संरचना के बीच, मिलीमीटर दर मिलीमीटर बढ़ते हुए नसों को बिना छुए, जोखिम को बिना बढ़ाए और असंभव से बिना डरे टीम ने उस नुकीले खतरे को बाहर निकाल लिया। सटीकता इतनी कि मानो समय भी ठहर गया हो। यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं थी यह जीवन के पक्ष में लड़ी गई एक मौन जंग थी जिसमें जीत का कोई शोर नहीं लेकिन असर इतिहास से भी गहरा। डॉ. सरज कुमार सिंह ने कहा कि रीढ़ के इतने करीब काम करना मानो जीवन की सबसे नाज़ुक रेखा पर चलना हो। वहीं डॉ. क्रांति भावना ने कहा कि हमने केवल सर्जरी नहीं की, हमने विश्वास को जिंदा रखा। इस ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण उपलब्धि पर संस्थान के कार्यकारी निदेशक प्रो. (ब्रिगे.) डॉ. राजू अग्रवाल ने इसे एम्स पटना की उत्कृष्टता, प्रतिबद्धता और उन्नत चिकित्सा क्षमता का प्रतीक बताया। आज यह उपलब्धि केवल एक रिकॉर्ड नहीं यह एक संदेश है कि जब इरादे अडिग हों, जब हाथों में हुनर हो और दिल में सेवा का जज़्बा हो तब असंभव भी सिर झुकाकर रास्ता दे देता है।
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