नेपाल में हुए ‘जलप्रलय’ ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. इस भीषण तबाही में अब तक 162 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है जबकि 750 से ज्यादा लोग लापता हैं. इसमें 133 भारतीय भी शामिल हैं. तिब्बती पहाड़ से निकली इस तबाही में करीब 1000 से ज्यादा लोगों के बहने की खबर है. नेपाल इस भीषण तबाही का जिम्मेदार चीन को मान रहा है. उसका कहना है कि कल यानी बुधवार को चीन के केरुंग इलाके में झील फटी. चीन ने इसकी जानकारी नहीं दी. 2 करोड़ घन मीटर पानी नेपाल आया. नेपाल ने आगे कहा कि चीन अगर पहले अलर्ट करता तो सतर्कता बरती जा सकती थी.वक्त पर जानकारी मिलता तो अलर्ट होता और ऐसी तबाही नहीं हुई होती. चीन की वजह से नेपाल में बाढ़ आई. जब चीन में पहले पानी आया तो उसने अलर्ट क्यों नहीं किया? ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नेपाल में बाढ़ से जो हाहाकार मची है, उसका जिम्मेदार वाकई चीन है, क्या भारत की सीमा के पास बन रहा चीन का बांध ‘वाटर बम’ जैसा है? आइए इस खबर के जरिए समझने की कोशिश करते हैं. नेपाल के रसुवा जिले के भोटे कोशी नदी में कल यानी बुधवार को आई इस भीषण बाढ़ ने जो नेपाल में तबाही मचाई है, उसने हिंदुस्तान की टेंशन बढ़ा दी है. यह नदी तिब्बत के शिशापांगमा पर्वत से निकलती है और नेपाल में प्रवेश करती है. यह नेपाल के सिंधुपालचौक और रसुवा जैसे जिलों से होकर बहती है. इस तबाही ने अब चीन के उस विशाल बांध के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है, जिसे वह भारत की सीमा के ठीक बगल में बना रहा है. चीन अरुणाचल की सीमा से करीब 30 किलोमीटर दूर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बना रहा है. यह जगह हिमालय के सबसे भूकंप-संभावित इलाकों में से एक है. इसकी चर्चा दशकों से चल रही थी. बीजिंग ने आठ महीने पहले इस परियोजना को मंजूरी दी. जुलाई 2025 में न्यिंगची में इसका निर्माण शुरू हो गया. यह परियोजना यारलुंग त्सांगपो नदी के बड़े मोड़ पर है. यहां नदी तेज मोड़ लेती है. इसके बाद यह भारत में सियांग नदी बनती है और असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है. योजना में 250 किलोमीटर लंबी घाटी में पांच बांध बनेंगे. नदी के छोटे हिस्से में लगभग 2000 मीटर की ऊंचाई से पानी गिरेगा. इसी से बिजली बनेगी. यह परियोजना 2033 के आसपास पूरी होगी. इसकी क्षमता 60 गीगावाट होगी. साल में करीब 300 अरब यूनिट बिजली बनेगी. यह थ्री गॉर्जेस डैम की क्षमता से लगभग तीन गुना ज्यादा है. लागत 137 से 170 अरब डॉलर के बीच अनुमानित है. भूवैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता परियोजना का आकार नहीं, बल्कि उसका स्थान है. मेडोग उस फॉल्ट जोन के पास है जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं इसलिए यह इलाका भूकंप के लिए बहुत संवेदनशील है.भले ही बांध बड़े भूकंप को झेलने के लिए बनाया गया हो, फिर भी तेज भूकंप आसपास के पहाड़ों में भूस्खलन, चट्टान गिरने और कीचड़ बहने जैसी घटनाएं पैदा कर सकता है. ये घटनाएं नदी और नीचे के इलाकों को नुकसान पहुंचा सकती हैं, भले ही बांध खुद सुरक्षित रहे. भारत ने पहले भी पानी के अचानक बदलने के असर देखे हैं. साल 2000 में तिब्बत में ऊपर की तरफ एक बांध टूट गया था. इससे पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में बाढ़ आ गई थी. 2017 में अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी अचानक काली हो गई थी. बाद में पता चला कि यह बदलाव तिब्बत में ऊपर की तरफ हो रहे खनन की वजह से हुआ था. इससे भारत में यह चिंता बढ़ गई कि सीमा पार की घटनाओं की पहले से कोई जानकारी नहीं मिलती. अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने चीन के मेडोग प्रोजेक्ट को ‘वाटर बम’ कहा है. उन्होंने चिंता जताई है कि नदी के ऊपरी हिस्से में बन रही यह बड़ी परियोजना सियांग नदी का पानी रोक सकती है या अचानक बहुत सारा पानी छोड़ सकती है. भारत ने बीजिंग के सामने अपनी चिंताएं औपचारिक रूप से बताई हैं. केंद्र सरकार अरुणाचल प्रदेश में 11,000 मेगावाट की सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना पर भी काम कर रही है. इस परियोजना का एक काम पानी के प्रवाह को नियंत्रित करना और ऊपर से अचानक आने वाले पानी से बचाव करना है लेकिन भारत की इस परियोजना का भी विरोध हो रहा है. ऊपरी सियांग जिले के आदि आदिवासी समुदाय इसका विरोध कर रहे हैं. मेडोग परियोजना मुख्य रूप से एक बड़ी जलविद्युत परियोजना है. लेकिन इसकी जगह की वजह से यह भारत के लिए बड़ा मुद्दा बन गई है. चिंताएं सिर्फ बिजली तक नहीं हैं. ये भूकंप, पानी के प्रवाह, आपदा प्रबंधन और नदी के नीचे रहने वाले लोगों की सुरक्षा तक फैली हुई हैं. नेपाल में घर, सड़कें और बिजली परियोजनाएं बह गईं. कम से कम 341 विदेशी यात्री लापता हैं. इनमें 100 से ज्यादा भारतीय नागरिक भी शामिल हैं. नेपाल में बाढ़ के बाद बिहार और यूपी में अलर्ट जारी किया गया है. बिहार में पश्चिम चंपारण समेत छह जिलों में निगरानी बढ़ाई गई है. वहीं, यूपी के महराजगंज और कुशीनगर में प्रशासन अलर्ट पर है. नेपाल से बढ़ा पानी गंडक बैराज तक पहुंच गया है. गंडक बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए गए. एनडीआरएफ की टीमें तैनात कर दी गई हैं. भारत से नेपाल के लिए राहत सामाग्री भेजी गई है.
