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विपक्ष के बाद अब कोर्ट से भी बार-बार उठने लगे (ईडी) पर सवाल, जानिए कब-कब जजों ने दिखाया आइना

प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी आजकल सुर्खियों में रहती है. हर महीने कहीं न कहीं छापेमारी की खबरें सामने आ जाती हैं. सबसे ज्यादा राजनीति से जुड़े लोगों के यहां छापेमारी की जानकारी सामने आती है. पिछले कुछ सालों से विपक्ष के टारगेट पर भी यही जांच एजेंसी रही है, लेकिन हैरान कर देने वाली बात ये है कि इसको लेकर देश की सर्वोच्च अदालत भी कई बार नाराजगी जता चुकी है और ईडी को उससे फटकार पड़ चुकी है. कोर्ट केंद्रीय एजेंसी के कामकाज पर सवाल उठा चुकी है, जिसमें कई मामले प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के हैं. देश की राजनीति में 2014 से पहले सबसे ज्यादा चर्चा सीबीआई की होती थी. उसके ऊपर विपक्ष आरोप लगाता था कि सरकार सीबीआई का जरिए उसे परेशान करती है. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया था कि सीबीआई पिंजरे में बंद तोते की तरह सरकार के इशारे पर काम करती है. अबकी बार शीर्ष अदालत ने ईडी से कहा है कि वो बदमाशों की तरह काम नहीं कर सकती है. आइए जानते हैं पिछले कुछ महीनों में ईडी को कोर्ट से कब-कब बड़ी फटकार लगी है? सबसे पहले बात करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को बदमाशों की तरह काम न करने की नसीहत क्यों दी है. दरअसल, कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि जांच एजेंसी बदमाशों की तरह काम नहीं कर सकती. उसका आचरण कानून के दायरे में होना चाहिए. कानून लागू करने वाले अधिकारियों और कानून का उल्लंघन करने वाले निकायों में अंतर होता है. सुप्रीम कोर्ट कार्ति पी. चिदंबरम और अन्य की ओर से दायर समीक्षा याचिकाओं को सुन रहा था, जिसमें 2022 के विजय मदनलाल चौधरी (वीएमसी) फैसले की सत्यता को चुनौती दी गई थी. इस केस में तमाम पीएमएलए प्रावधानों को बरकरार रखा गया था. इस मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली और जस्टिस उज्ज्वल भुयान न जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की तीन सदस्यीय पीठ कर रही थी. सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि वह एजेंसी की छवि को लेकर चिंतित है . कानून प्रवर्तन एजेंसियों और कानून का उल्लंघन करने वालों में अंतर होता है. ईडी की बेहद कम दोषसिद्धि दर की आलोचना करते हुए कोर्ट ने संसद में सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों का हवाला दिया और कहा कि 5000 मामलों के बाद 10 से भी कम दोषसिद्धि हुए हैं. ऐसा क्यों है? हम ईडी की छवि को लेकर भी उतने ही चिंतित हैं.’ सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 21 जुलाई को ईडी की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) जमीन आवंटन मामले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी बी.एम. पार्वती के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी गई थी. भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए मौखिक टिप्पणी की थी और कहा था कि मतदाताओं के बीच राजनीतिक लड़ाई लड़ी जाए. इसके लिए ईडी का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है? सीजेआई ने ईडी की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू से कहा था, ‘कृपया हमें मुंह खोलने के लिए मजबूर न करें. अन्यथा, हमें ईडी के बारे में कुछ कठोर टिप्पणियां करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. दुर्भाग्य से, मुझे महाराष्ट्र का कुछ अनुभव है. देश भर में इस हिंसा को न फैलाएं. राजनीतिक लड़ाई मतदाताओं के सामने लड़ी जानी चाहिए. ईडी का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?’  उसने सारी हदें पार करने के लिए एजेंसी की आलोचना की थी. कोर्ट ने जांच एजेंसी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू से कहा था, ‘आपकी ईडी सभी सीमाएं लांघ रही है. यह अपराध निगम के खिलाफ कैसे हो सकता है? आप देश के संघीय ढांचे का पूरी तरह से उल्लंघन कर रहे हैं. आप राज्य द्वारा संचालित टीएएसएमएसी पर छापा कैसे मार सकते हैं?’ दिल्ली के कथित शराब घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई 2024 को अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी थी. इस दौरान कोर्ट ने ईडी की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए सख्त टिप्पणी की थी. उसका कहना था कि आरोपी को गिरफ्तार करते समय पिक एंड चूज की पॉलिसी को नहीं अपनाया जा सकता है. साथ ही साथ गिरफ्तार करने वाले को फंसाने वाली सामग्री चुनने की भी इजाजत नहीं दी जा सकती है. पीएमएलए की धारा की शक्ति का इस्तेमाल अधिकारी के मर्जी के मुताबिक नहीं हो सकता है. एजेंसी की जांच के मामले में एकरूपता दिखाई देनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में ईडी की खिंचाई करते हुए कहा था कि केंद्रीय एजेंसी लगातार पूरक आरोपपत्र दाखिल नहीं कर सकती और किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के जेल में नहीं रख सकती. जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की शीर्ष अदालत की पीठ ने यह टिप्पणी झारखंड में कथित अवैध खनन के धन शोधन मामले में एजेंसी की ओर से चार पूरक आरोपपत्र दाखिल करने पर आपत्ति जताते हुए की थी. शीर्ष अदालत झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कथित सहयोगी प्रेम प्रकाश की डिफॉल्ट जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे अगस्त 2022 में गिरफ्तार किया गया था. वहीं, शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को तर्कसंगत बताते हुए हेमंत सोरेन की जमानत को बरकरार रखा था. हाई कोर्ट के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए शीर्ष अदालत ने ईडी से कहा था कि वह और कुछ नहीं देखना चाहती है, अगर वह और कुछ देखेगी तो एजेंसी मुश्किल में पड़ सकती है. ईडी लगातार विपक्ष से जुड़े नेताओं के यहां रेड से निशाने पर रही है. विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि केंद्र बदले की राजनीति की वजह से वह ऐसा करती आ रही है. अगर कोई भी नेता जिसके ऊपर केस चल रहा है और वह बीजेपी में शामिल हो जाता है तो उसके खिलाफ फिर जांच नहीं होती है. वह बीजेपी की वॉशिंग मशीन में धुल जाता है. इसके लिए विपक्ष हेमंत बिस्वा सरमा, अजित पवार, शुभेंदु अधिकारी और मुकुल रॉय जैसे नेताओं का उदाहरण देते आया है. हालांकि बीजेपी ने लगातार इन आरोपों का खंडन किया है और दावा किया है कि कोर्ट को उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले हैं.

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