ब्रह्माकुमारी संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय अभियान ‘कर्मयोग द्वारा सशक्त भारत’ का शुभारंभ करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। राष्ट्रीय महत्व के इस अभियान को मूर्त रूप देने के लिए मैं ब्रह्माकुमारी
परिवार के सभी सदस्यों को बधाई देती हूं। हमने अपने देश को वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य रखा है। एक विकसित राष्ट्र के निर्माण के लिए राजनीतिक स्थिरता और मजबूत अर्थव्यवस्था के साथ-साथ स्वस्थ, शिक्षित तथा जिम्मेदार नागरिक होना आवश्यक हैं क्योंकि देशवासियों की सक्रिय भागीदारी के बिना किसी भी राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है। किसी भी देश के संतुलित और समग्र विकास के लिए भौतिक प्रगति में नैतिकता और आध्यात्मिकता का समायोजन अत्यंत आवश्यक है। आर्थिक प्रगति से समृद्धि बढ़ती है तथा तकनीकी प्रगति नवाचार, दक्षता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है। ये एक समृद्ध राष्ट्र की नींव रखते हैं। लेकिन नैतिकता-विहीन आर्थिक और तकनीकी विकास समाज में असंतुलन पैदा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अनैतिक आर्थिक प्रगति से धन और संसाधन का केन्द्रीकरण हो सकता है, पर्यावरण को क्षति हो सकती है, समाज के कमजोर वर्गों का शोषण हो सकता है। नैतिक मूल्यों के बिना technology का प्रयोग मानवता के लिए संहारक हो सकता है।अध्यात्म हमें कुछ आधारभूत मूल्य और एक नैतिक रूपरेखा प्रदान करता है जो कर्मयोग या निस्वार्थ सेवा करने के लिए प्रेरित करते हैं। अध्यात्म सत्यनिष्ठा, करुणा, अहिंसा और दूसरों की सेवा जैसे सद्गुणों पर भी बल देता है। ये ऐसे सिद्धांत हैं जो एक शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। जब हमारे विचार आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होते हैं तब हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सर्व के कल्याण की सोच पाते हैं। देश के नेतृत्व में आध्यात्मिकता के आधार पर न्यायपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिए जा सकते हैं। ऐसे निर्णय किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के हित के लिए होते हैं। जब सरकार के कार्य न्यायपूर्ण होते हैं तो उससे स्वतः ही समाज में विश्वास और स्थिरता को बढ़ावा मिलता है। भगवद्गीता हमें अपने कर्मों को उच्च उद्देश्य के लिए समर्पित करने का मार्ग बताती है। गीता सिखाती है कि हम अपने कर्तव्यों के पालन के लिए उत्तरदायी हैं, लेकिन हमें अपने कर्मों के परिणाम के प्रति आसक्त नहीं होना चाहिए। हमें कर्म पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर उसे ईश्वर या परमार्थ के लिए समर्पित करना चाहिए, बिना यह चिंता किए कि इससे सफलता मिलेगी या नहीं। निःस्वार्थ भाव से और अहंकार रहित कर्म करने से हृदय शुद्ध होता है। कर्मयोग का निःस्वार्थ सेवा से गहरा संबंध है। सेवा भाव से कर्म करना और उन कर्मों के फल ईश्वर या समाज को अर्पित करना, सर्वोच्च कोटि के कर्मयोग में गिना जाता है। गीता सिखाती है कि प्रेम और समर्पण के साथ किया गया कोई भी कार्य, चाहे वह कितना भी छोटा या बड़ा क्यों न हो, निःस्वार्थ भाव से किया जाए तो सार्थक होता है। महात्मा गांधी का जीवन भी कर्मयोग का एक व्यावहारिक उदाहरण था। उन्होंने गीता में दी गई कर्मयोग की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारा और आध्यात्मिकता को सामाजिक कार्यों के साथ सम्मिलित कर अपनी राजनीतिक गतिविधियों, समाज सेवा और व्यक्तिगत अनुशासन को एक प्रकार की भक्ति में बदल दिया।
