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गन्ने की खोई से होगा बिजली का उत्पादन, बिहार में अब लगेंगे 2 MW के छोटे प्लांट, सस्ती होगी इलेक्ट्रिसिटी

बिहार में गन्ने की खोई यानी बगास अब सिर्फ चीनी मिलों का कचरा नहीं रहेगी, बल्कि बिजली उत्पादन का बड़ा जरिया बनेगी। बिहार विद्युत विनियामक आयोग ने छोटे बिजली संयंत्रों को बढ़ावा देने के लिए अहम फैसला सुनाया है। अब राज्य में गन्ने की खोई से 2 मेगावाट तक बिजली उत्पादन करने वाले छोटे प्लांट लगाए जा सकेंगे। पहले इसके लिए न्यूनतम 5 मेगावाट क्षमता वाले संयंत्र की अनुमति थी। आयोग के इस फैसले से छोटे उत्पादकों के लिए बिजली उत्पादन के मैदान में उतरने का रास्ता आसान होगा।आयोग ने बिजली खरीद समझौते की अवधि में भी बड़ा बदलाव किया है। पहले उत्पादकों के साथ 15 साल का पावर खरीद एग्रीमेंट किया जाता था, जिसे अब घटाकर 5 साल कर दिया गया है। आयोग का मानना है कि गन्ने की खोई की कीमत और बिजली उत्पादन की लागत समय के साथ बदलती रहती है। ऐसे में छोटी अवधि का समझौता बाजार की बदलती परिस्थितियों के हिसाब से ज्यादा व्यावहारिक होगा। इस फैसले से छोटे बिजली उत्पादकों को अपने संयंत्र लगाने में कम जोखिम उठाना पड़ेगा। उत्पादक प्रतिस्पर्धी दरों पर बिजली उपलब्ध करा सकेंगे। बिहार की साउथ और नॉर्थ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए बगास से बनने वाली करीब 100 मेगावाट बिजली की खरीद को भी आसान बनाने की दिशा में यह आदेश अहम माना जा रहा है।बिहार विद्युत विनियामक आयोग के अध्यक्ष अमीर सुबहानी और सदस्य पीएस यादव व मनोज कुमार की पीठ ने बिजली होल्डिंग कंपनी की याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किया है। आयोग ने बिजली उत्पादन करने वाले संयंत्रों के लिए सालाना बिजली सप्लाई के लक्ष्य में भी बड़ी राहत दी है। पहले संयंत्रों को अपनी कुल क्षमता की 53 प्रतिशत बिजली सालभर उपलब्ध कराना जरूरी था। लेकिन गन्ने की पेराई का सीजन मुख्य रूप से अक्टूबर से फरवरी तक रहता है। ऐसे में पूरे साल बिजली उत्पादन करना व्यावहारिक नहीं था।अब न्यूनतम सालाना सप्लाई का लक्ष्य घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है। अगर कोई प्लांट निर्धारित लक्ष्य पूरा नहीं कर पाता है तो बिजली की कमी पर तय दर के आधे के बराबर जुर्माना लगाया जाएगा। इन संयंत्रों से बनने वाली बिजली सीधे ट्रांसमिशन ग्रिड में जाएगी। नए नियमों में कंपनियों को एक और बड़ी सहूलियत दी गई है। अगर किसी कंपनी के पास एक से ज्यादा चीनी मिल या बिजली संयंत्र हैं, तो वह प्रत्येक मिल के लिए अलग-अलग बोली लगा सकेगी। पहले एक कंपनी को सिर्फ एक बोली लगाने की अनुमति थी।इस बदलाव से टेंडर में ज्यादा कंपनियों के शामिल होने की उम्मीद है। ज्यादा प्रतिस्पर्धा से बिजली की खरीद दरें कम हो सकती हैं और सरकारी बिजली वितरण कंपनियों को सस्ती बिजली मिलने का रास्ता खुल सकता है। इसका फायदा आखिरकार आम उपभोक्ताओं को मिल सकता है।

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