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अवेयरनेस से एक्शन तक- रिटायरमेंट प्लानिंग में ऑनरशिप ही असली बदलाव की कुंजी – अनुराग गुप्ता

हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां औसत भारतीय प्रोफेशनल लोग फाइनेंशियल टर्म्स के बारे जानकारी का चलता-फिरता खजाना हैं, लेकिन अभी भी रिटायरमेंट के बाद की तैयारियों का स्तर आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम है। हम आसानी से एप के माध्यम से होने वाले निवेश के बारे में जान लेते हैं और दुनियाभर के बाजारों के ट्रेंड के बारे में चर्चा करते हैं, लेकिन जब आज से 30 साल बाद के बारे में कुछ तैयारी करने की बारी आती है, तो हम सभी के दिमाग पर एक खास किस्म की सोच हावी हो जाती है। अनुराग गुप्ता, निदेशक एवं मुख्य व्यवसाय अधिकारी, साझेदारी चैनल, एक्सिस मैक्स लाइफ इंश्योरेंस लिमिटेड ने कहा कि भारत में वित्तीय जागरूकता बढ़ने के बावजूद रिटायरमेंट की तैयारी अभी भी कमजोर है। लोग निवेश और बाजार की जानकारी रखते हैं, लेकिन भविष्य की ठोस योजना बनाने में पीछे रह जाते हैंकृयही अवेयरनेस और एक्शन के बीच का बड़ा अंतर है। उन्होंने बताया कि महंगाई, खासकर हेल्थकेयर खर्च, रिटायरमेंट के बाद की सबसे बड़ी चुनौती है। आज का 50,000 रुपये मासिक खर्च 30 साल में करीब 2.87 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद अधिकांश लोग पर्याप्त बचत नहीं कर पा रहे हैं और पारंपरिक एसेट्स जैसे सोना या जमीन पर निर्भर रहते हैं, जो जरूरत के समय नकदी नहीं दे पाते। गुप्ता ने ऑनरशिप आधारित अप्रोच पर जोर देते हुए तीन-स्टेप रोडमैप सुझायाकृवर्तमान खर्च का आकलन, रिटायरमेंट गैप की पहचान, और जल्दी निवेश की शुरुआत। उन्होंने कहा कि एन्यूटी जैसे प्रोडक्ट्स नियमित और गारंटीड आय सुनिश्चित कर सकते हैं। उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि रिटायरमेंट प्लानिंग सिर्फ भविष्य की सुरक्षा नहीं, बल्कि वर्तमान मानसिक शांति से भी जुड़ी है। जानकारी से आगे बढ़कर एक्शन लेना ही असली सेल्फ-केयर है, उन्होंने जोड़ा। इंडिया रिटायरमेंट इंडेक्स स्टडी (आइरिस) 5.0 से मिले आंकड़ों से लगातार एक निर्भरता की तस्वीर सामने आ रही है। ज्यादातर भारतीय आज भी बच्चों को अपना सुरक्षा कवच मानकर चलते हैं। हालांकि शहरों की ओर हो रहे पलायन और न्यूक्लियर फैमिली के आम होते जाने से यह सोच अब कमजोर पड़ रही है। निर्भरता की इस सोच के साथ-साथ निष्क्रियता की आदत भी बड़ी समस्या है। यह ऐसी आदत है जिसमें लोग इसलिए कुछ नहीं करते क्योंकि लक्ष्य उन्हें बहुत दूर या अवास्तविक लगता है। ऐसे में एक अनुशासित देरी की स्थिति बन जाती है, जिसमें हम शुरुआत करने के लिए किसी सही समय का इंतजार करते रह जाते हैं और वह समय असल में कभी आता ही नहीं है। आइरिस 5.0 के नतीजे बताते हैं कि भारत में कुल रिटायरमेंट इंडेक्स सुधरकर 46 पर पहुंचा है, लेकिन ‘फाइनेंशियल’ मामले में अभी मामला कमजोर है। बहुत से भारतीय बचत कर रहे हैं, लेकिन वह 20 से 30 साल में महंगाई के कारण पड़ने वाले प्रभाव को खत्म कर सकने लायक भी बचत नहीं कर पा रहे हैं। आइरिस 5.0 से बड़ी जानकारी सामने आई है हेल्थ प्रिपेयर्डनेस इंडेक्स में सुधार की। रिटायरमेंट प्लानिंग अब सिर्फ ‘इनकम रिप्लेसमेंट’ की बात नहीं है, बल्कि यह मेडिकल के स्तर पर सम्मानजनक जीवन जीने से जुड़ा है। सामान्य महंगाई की तुलना में भारत में स्वास्थ्यसेवा की लागत दोगुनी दर से बढ़ रही है। ऐसे में अपने परिवार पर बोझ न बनने के लिए जरूरी है कि आपके पास फाइनेंशियल ऑनरशिप हो। टियर 2 और टियर 3 शहरों में संयुक्त परिवार का ढांचा तेजी से बदल रहा है, ऐसे में ‘आत्म निर्भरता’ विकल्प की बात नहीं है, बल्कि जरूरत है। 70 साल के बाद की उम्र में कोई मेडिकल इमरजेंसी पड़ने पर तुरंत नकदी की जरूरत होगी, न कि किसी पुश्तैनी जमीन से काम चलेगा। आइरिस 5.0 का सबसे महत्वपूर्ण डाटा प्लानिंग और मानसिक स्वास्थ्य के बीच का संबंध है। जल्दी शुरुआत करने वाले कम चिंतित होते हैं और उनके जीवन में संतुष्टि ज्यादा होती है। रिटायरमेंट ऑनरशिप का मतलब सिर्फ कल का बैंक बैलेंस नहीं हैं, बल्कि यह आज की मानसिक शांति से भी जुड़ा है। जब आप जानकारी और कदम के बीच का अंतर मिटाते हैं, तो असल मायने में अपने भविष्य की लगाम अपने हाथों में लेते हैं। ‘रीडर’ से एक ‘पॉलिसीहोल्डर’ बनना सेल्फ केयर की दिशा में इकलौता सबसे महत्वपूर्ण कदम है, जो आप उठा सकते हैं। आज ही शुरुआत करें, क्योंकि भविष्य का गणित आपके फैसले पर टिका है, न कि सिर्फ आपकी जानकारी पर।

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